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जब लखीमपुर की प्रयोगशाला से उठी आवाज, यूरोप तक गूंजा भारतीय विज्ञान

डॉ. वी.बी. धुरिया के शोध ने वैकल्पिक चिकित्सा में भारत की नई पहचान गढ़ी

संवाददाता
लखीमपुर खीरी (संज्ञान दृष्टि)।मिट्टी की सौंधी खुशबू से भरे इस जनपद की एक प्रयोगशाला से उठी एक शांत-सी लहर आज समंदर पार यूरोप तक अपनी पहचान बना रही है। यह लहर है शोध, विश्वास और भारतीय नवाचार की—जिसे दिशा दी है होमियोपैथी विशेषज्ञ एवं शोधकर्ता डॉ. वी.बी. धुरिया ने।वर्षों से जर्मन होमियोपैथी रिसर्च सेंटर इकाई एवं संयुक्त अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान के मंच पर कार्यरत डॉ. धुरिया ने न केवल वैकल्पिक चिकित्सा को जन-जन तक पहुंचाया, बल्कि इसे वैज्ञानिकता के साथ विश्व पटल पर प्रतिष्ठित करने का साहस भी दिखाया। उनके शब्दों में, “मीठी गोलियों” की सादगी में छिपा यह विज्ञान, लोगों के विश्वास से ही वैश्विक सम्मान तक पहुंचा है।

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जर्मनी की धरती से लेकर जापान के शोध मंचों तक, इटली की प्रयोगशालाओं से अमेरिका के विमर्शों तक—डॉ. धुरिया के शोध ने एक लंबा सफर तय किया है। वर्ष 2008 में विकसित उनकी टिंचर स्पैजरिक इशेंस की तकनीक ने जैसे एक नई दिशा दी, जहां भारतीय प्रयोगशाला की सूझबूझ ने पुरानी स्थापित विधियों को चुनौती दी।यह केवल एक वैज्ञानिक उपलब्धि नहीं, बल्कि उस आत्मविश्वास की कहानी है, जो वर्षों से अपने अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था।जब शोध शब्दों से आगे बढ़कर प्रमाण बनते हैं, तो उन्हें सीमाएं रोक नहीं पातीं। डॉ. धुरिया के कार्य भारत सरकार के शोध गजट (2023) में स्थान पा चुके हैं और अंतरराष्ट्रीय जर्नलों में प्रकाशित होकर उन्होंने अपनी पहचान को और मजबूत किया है। कई सम्मान, उपाधियां और पदक इस यात्रा के मूक साक्षी हैं।लखीमपुर खीरी का यह शोध केंद्र अब केवल एक स्थान नहीं, बल्कि एक विचार बन चुका है—जहां से निकलने वाली हर खोज यह संदेश देती है कि छोटे शहरों की प्रयोगशालाएं भी बड़े सपनों को आकार दे सकती हैं।

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