
एजेंसी
नई दिल्ली, 27 अक्टूबर। दवाओं की बढ़ती कीमतों और मरीजों से वसूले जा रहे अधिक दामों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। न्यायालय ने राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए कहा कि यह संस्था पूरी तरह निष्क्रिय नजर आती है। अदालत ने सवाल किया कि दवाओं की कीमतों के निर्धारण और नियंत्रण की मौजूदा व्यवस्था आखिर किसके हित में काम कर रही है न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ दवाओं की कीमतों में अंतर और मरीजों से अधिक रकम वसूले जाने से संबंधित दो याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। सुनवाई के दौरान अदालत ने दवाओं के अधिकतम खुदरा मूल्य (एमआरपी) और खुदरा विक्रेताओं को मिलने वाली कीमत के बीच बड़े अंतर पर चिंता जताई। पीठ ने सवाल किया कि जब सरकार की निगरानी में यह सब हो रहा है, तो ऐसी व्यवस्था को अनियंत्रित तरीके से चलने की अनुमति क्यों दी जा रही है।

केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने दलील दी कि सरकार की नीति पूरे दवा कारोबार के तंत्र को नियंत्रित करने की नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि भारत में दवाओं की कीमतें दुनिया के कई देशों की तुलना में कम हैं। हालांकि, अदालत ने दवाओं की कीमतों में भारी अंतर को लेकर अपनी चिंता दोहराई और पूछा कि पूरी व्यवस्था दवा निर्माताओं के हितों को साधने वाली क्यों दिखाई दे रही है। सुनवाई के दौरान पीठ ने स्पष्ट किया कि दवाओं की कीमतों के मामले में प्रभावी निगरानी और उचित नियंत्रण जरूरी है, ताकि आम मरीजों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ न पड़े। अदालत ने मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया।
कैंसर की दवाओं के दाम पर भी उठे सवाल
दवाओं की कीमतों को नियंत्रित करने का मुद्दा इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट में उठ चुका है। 12 अक्टूबर को हुई सुनवाई में अदालत ने कैंसर की दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन को अधिकतम खुदरा मूल्य के 30 प्रतिशत तक सीमित करने के संबंध में केंद्र सरकार के जवाब पर असंतोष जताया था। पीठ ने सवाल किया था कि जब कैंसर की कुछ दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन सीमित किया जा सकता है, तो अन्य दवाओं के मामले में भी ऐसी व्यवस्था लागू करने पर विचार क्यों नहीं किया जा सकता।
केंद्र सरकार ने पहले बताया था कि कैंसर की गैर-अनुसूचित दवाओं पर व्यापारिक मार्जिन सीमित करने के फैसले से मरीजों को राहत मिलने की उम्मीद है। सरकार के अनुसार, इस कदम से दवाओं की कीमतों में कमी आ सकती है और इलाज का खर्च घट सकता है।
मरीजों को राहत देने की जरूरत
दवाओं की कीमतों में असमानता का सीधा असर मरीजों और उनके परिवारों पर पड़ता है। गंभीर बीमारियों के इलाज में लंबे समय तक दवाएं खरीदने की जरूरत होने के कारण अधिक कीमतें आर्थिक परेशानी बढ़ा सकती हैं। ऐसे में दवाओं की कीमतों की पारदर्शी व्यवस्था, निर्धारित दरों का पालन और नियमों के उल्लंघन पर प्रभावी कार्रवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण को दवाओं की कीमतों की निगरानी, निर्धारित मूल्य से अधिक वसूली की जांच और संबंधित नियमों के अनुपालन की जिम्मेदारी दी गई है। सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणी ने इस व्यवस्था की प्रभावशीलता और दवा बाजार में मूल्य नियंत्रण को लेकर बहस फिर तेज कर दी है।


