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“मिट्टी की थाप से सुरों की पहचान तक – कुमार रजनीश उर्फ मंटु की कहानी”

डॉ रामानुज

गया जी  की पावन धरती… जहां इतिहास, संस्कृति और आस्था एक साथ सांस लेते हैं। उसी मिट्टी में 2 मई 1979 को जन्म हुआ एक ऐसे बालक का, जिसकी उंगलियों में भविष्य ने पहले ही संगीत की लय लिख दी थी—नाम कुमार रजनीश, जिन्हें लोग प्यार से मंटु कहकर बुलाते हैं। माता आशा देवी और पिता पुरुषोत्तम दुबे के स्नेह में पले-बढ़े रजनीश का बचपन कुछ अलग था। उनका अधिकतर समय अपने ननिहाल में बीता—और शायद यही वह मोड़ था, जहां उनके जीवन की दिशा तय हो गई। ननिहाल का वातावरण, नानाजी की संगीत साधना, और सुरों की वह अनकही दुनिया… इन सबने उनके भीतर एक अनजानी सी चिंगारी जगा दी। जब वे महज पांचवीं कक्षा में थे, तब उन्होंने अपने मामाजी पंडित श्रीकांत तिवारी को अपना गुरु मान लिया। वही दिन था, जब उनकी उंगलियों ने पहली बार तबले की सतह को छुआ—और जैसे जीवन ने अपनी असली राह पकड़ ली। नेहरू विद्या मंदिर से प्राथमिक शिक्षा, फिर सेंट पॉल स्कूल से आठवीं तक की शिक्षा और महावीर उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से दसवीं की पढ़ाई पूरी करते हुए, उन्होंने पढ़ाई के साथ-साथ संगीत को कभी पीछे नहीं छोड़ा। 1996 में इंटरमीडिएट और 1999 में गया कॉलेज से राजनीतिक विज्ञान में स्नातक की डिग्री हासिल की—लेकिन दिल तो हमेशा ताल और लय में ही बसता रहा।

संगीत के प्रति उनकी लगन उन्हें प्राचीन कला केंद्र, चंडीगढ़ तक ले गई, जहां से उन्होंने “भास्कर” (संगीत में स्नातकोत्तर) की उपाधि प्राप्त की। लेकिन असली शिक्षा किताबों से नहीं, बल्कि गुरुओं के चरणों में मिली। देश के जाने-माने संतूर वादक तरुण भट्टाचार्या, गया घराने के प्रसिद्ध ठुमरी गायक पंडित कामेश्वर पाठक, गोवर्धन मिश्रा और राजन सीजुआर जैसे महान गुरुओं के सानिध्य में उन्होंने न केवल तबले की बारीकियां सीखीं, बल्कि संगत की उस कला को भी आत्मसात किया, जो हर कलाकार को पूर्ण बनाती है। आज भी उनकी साधना जारी है—वे वाराणसी के पंडित किशोर मिश्रा से निरंतर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। यही उनकी असली पहचान है—सीखना कभी नहीं छोड़ना। कम उम्र में ही उन्होंने देश के विभिन्न मंचों पर अपनी कला का जादू बिखेरा। उनकी थाप में सिर्फ ध्वनि नहीं, बल्कि आत्मा की गूंज होती है—और यही कारण है कि उन्हें अनेक सम्मान भी प्राप्त हुए। आज उनके शिष्य भी संगीत की दुनिया में अपना नाम रोशन कर रहे हैं—जो उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है। उनका जीवन केवल संगीत तक सीमित नहीं रहा। 2013 में उन्होंने डॉ. शिल्पी शुक्ला के साथ विवाह किया, और जीवन में एक नई सुरमयी साझेदारी शुरू हुई। यह जोड़ी केवल अपने लिए नहीं, बल्कि समाज के लिए भी जीती है। दोनों मिलकर जरूरतमंदों के बीच जाकर होमियोपैथिक चिकित्सा के माध्यम से निःस्वार्थ सेवा करते हैं—स्वास्थ्य जांच से लेकर निःशुल्क दवा वितरण तक। 2015 में उनके जीवन में एक और मधुर स्वर जुड़ा—जब वे समृद्धि के पिता बने। यह वह क्षण था, जब उनकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत राग पूरा हुआ। आज रजनीश मिश्रा सिर्फ एक कलाकार नहीं हैं—वे एक गुरु, एक समाजसेवी, एक समर्पित पति और एक स्नेही पिता हैं। उनकी कहानी हमें यह सिखाती है कि अगर जुनून सच्चा हो, तो साधारण शुरुआत भी असाधारण मुकाम तक पहुंचा सकती है।यह कहानी है उस इंसान की, जिसने मिट्टी की थाप को सुरों की पहचान बना दिया… और अपने जीवन को एक अनवरत राग।

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